वेदांत परम्परा में आत्मज्ञान ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कोई अकेले पुस्तकों से खोज ले। यह ऐसे गुरु से प्राप्त होता है जिसने स्वयं इसे प्राप्त किया हो — ठीक वैसे ही जैसे उपनिषद् जिज्ञासु को ऐसे गुरु के पास जाने का उपदेश देते हैं जो श्रोत्रिय हो और ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो।
परम्परा का अर्थ है “एक के बाद एक”: एक अविच्छिन्न शृंखला। गुरु–शिष्य परम्परा गुरुओं और शिष्यों की वह पंक्ति है जिसके माध्यम से एक शिक्षा, व्याख्या की एक पद्धति और एक जीवंत आदर्श अक्षुण्ण रूप में आगे सौंपे जाते हैं। शृंगेरी में इस शृंखला का एक संस्थागत रूप भी है: प्रत्येक आचार्य अपने चुने हुए शिष्य को संन्यास की दीक्षा देते हैं, उन्हें नामित उत्तराधिकारी घोषित करते हैं, व्यक्तिगत रूप से उन्हें प्रशिक्षित करते हैं, और पीठम् पर वही शिष्य उनके उत्तराधिकारी होते हैं।
इसलिए जगद्गुरु का अधिकार व्यक्तिगत आकर्षण या निर्वाचन पर आधारित नहीं है। वह इसी उत्तराधिकार पर आधारित है — उस व्यक्ति से शिक्षा और पीठ प्राप्त करने पर, जिसने स्वयं उन्हें अपने पूर्ववर्ती से प्राप्त किया था। यही कारण है कि भक्त केवल अपने गुरु को ही नहीं, बल्कि समूची परम्परा को प्रणाम करते हैं।